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परिंदे व दीवारें - कविमन की बगिया में

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  गाएँ गुनगुनाएँ समूह में हर सप्ताह मिले टास्कों से समूह की नियमितता बनी रहती है| कभी कभी गीतों के अतिरिक्त कुछ टास्क अलग हटकर मिल जाते तो उन्हें सहेज लेने को जी चाहता है| ऐसा ही एक टास्क ग्रुप में लम्बे समय पश्चात् पुनः जुड़ कर सक्रिय हुई सदस्या शीतल माहेश्वरी ने दिया| उन्होंने एक चित्र दिया जिस पर सभी को अपने भाव व्यक्त करने थे| एक ही चित्र पर भावों ने कैसे कैसे रंग बदले, यह देखना अभूतपूर्व रहा| इस पोस्ट में पहले वही चित्र दे रही हूँ| उसके बाद रचनाकारों की कविताएँ होंगी| रचनाकारों का क्रम अभिव्यक्ति आने के क्रम के अनुसार रखा गया है| सर्वप्रथम शीतल द्वारा दिया गया चित्र देखें| टास्क का चित्र शीतल माहेश्वरी शामिल कवयित्रियाँ-- 1.रचना दीक्षित जी 2.ऋता शेखर 3.शोभना चौरे दी 4.प्रतिभा द्विवेदी जी 5.साधना वैद दी 6.अंजू गुप्ता तितली जी 7.रश्मिप्रभा दी 8. उषा किरण दी 9. गिरिजा कुलश्रेष्ठ दी 10. संध्या शर्मा जी 11. अर्चना चाव जी 12. पूजा अनिल ========================= ========================= 1. रचना दीक्षित    तन्हाई    कभी फुर्सत में देखती हूँ     अपने...

चित्र एक-भाव अनेक

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  यह चित्र चित्रकला में सिद्धहस्त कलाकार आदरणीया उषा किरण दी का है| उषा दी की प्रकाशित पुस्तक 'ताना बाना' से मैंने टास्क के लिए आभार के साथ लिया है| सभी को इस चित्र पर कविता लिखनी है और गीत भी गाने हैं| प्रस्तुत हैं उन सबकी प्रस्तुतियाँ १. वंदना अवस्थी दूबे जी पिता जी की कविता ससम्मान दी जा रही , नमन उन्हें !! समर्पण जीवन के स्वयं समर्पण को मैं जीत कहूं या हार कहूं? मैने देखी प्राचीर रश्मि, देखा संध्या का अंधकार, पूनो की रजत-ज्योत्सना में, लख सका अमा का तम अपार, इन काली-उजली घड़ियों को, मैं दिवस या कि अवसान कहूं? जीवन के स्वयं समर्पण को मैं जीत कहूं या हार कहूं? जीवन की कश्ती छोड़ चुका, सरि की उत्ताल तरंगों में, बढ़ चली किन्तु पथभ्रष्टा सी, मारुति के मत्त झकोरों में, लहरों-झोंकों से निर्मित पथ की, कूल या कि मझधार कहूं? जीवन के स्वयं समर्पण को मैं जीत कहूं या हार कहूं? अपना सबकुछ खो देने पर अपनी सर्वस्व प्राप्ति देखी, सर्वस्व हार जाने पर भी, अपनी सम्पूर्ण विजय देखी, तब, इस सम्पूर्ण समर्पण को, वंचना कहूं या लब्धि कहूं? जीवन के स्वयं समर्पण को मैं जीत कहूं या हार कहूं? ०रामरतन अवस्थी...

''गायें गुनगुनाएँ शौक से'' समूह में 1 फरवरी 2022 का टास्क

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1 फरवरी 2022 का टास्क नोट कर लें - यह तस्वीर टर्किश आर्टिस्ट अब्दुल्लाह एविन्दार द्वारा ली गई है। इसे देख कर जो भी भाव आयें, उस पर 50 -100 शब्द लिखें। कविता, कहानी, लघुकथा, दोहा, हाइकु, ग़ज़ल, शायरी सब मान्य है। गाना भी उसी भाव पर गायें। - पूजा अनिल  सदैव रचनात्मक रहने वाले ''गायें गुनगुनाएँ शौक से'' समूह में आज के टास्क हेतु हमें समूह में जो रचनाएं  जिस क्रम में प्राप्त हुईं वे सभी उसी क्रम में   यहाँ प्रदर्शित की जा रही हैं।   रश्मि प्रभा   उम्र कोई हो, एक लड़की- १६ वर्ष की, मन के अन्दर सिमटी रहती है... पुरवा का हाथ पकड़ दौड़ती है खुले बालों में नंगे पाँव.... रिमझिम बारिश मे ! अबाध गति से हँसती है कजरारी आंखो से, इधर उधर देखती है... क्या खोया? - इससे परे शकुंतला बन फूलों से श्रृंगार करती है " बेटी सज़ा-ए-आफ़ता पत्नी" बनती होगी पर यह, सिर्फ़ सुरीला तान होती है! यातना-गृह मे डालो या अपनी मर्ज़ी का मुकदमा चलाओ , वक्त निकाल , यह कवि की प्रेरणा बन जाती है , दुर्गा रूप से निकल कर " छुई-मुई " बन जाती है- यह लड़की! मौत को चकमा तक दे जाती है.... तभी तो "...

काव्यों पर काव्यमयी टिप्पणियाँ

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  व्हाट्सएप्प समूह 'गाएँ गुनगुनाएँ शौक से' पर हर हफ़्ते बारी बारी किसी एक सदस्य को हर दिन एक टास्क देना होता है जिसे बाकी के लोग अपनी सुविधानुसार करते हैं| किसी एक ही विषय पर सभी के फ़िल्मी, नॉन फ़िल्मी गीत या ग़ज़ल होते हैं| कभी कभी किसी सृजन के लिए भी कहा जाता है| इस समूह में कुछ तो पहले से ही कोकिलकंठी थीं, कुछ  बार बार के अभ्यास से उस जमात में शामिल हो चुकी हैं| टास्क पूरा करने में आदरणीया साधना वैद जी, शोभना जी, रश्मिप्रभा जी एवं गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी की नियमितता देखते बनती है|  समूह सिर्फ गायकी में ही नहीं, लेखन एवं रेखांकन में भी आगे है| कभी समूह की कमउम्र सदस्या आराधना मिश्रा एवं वरिष्ठ सदस्या उषा किरण जी की मास्टर पेंटिंग और बाकियों की नौसिखिया पेंटिंग की  पोस्ट भी लगाऊँगी| जनवरी के दूसरे सप्ताह में बेहतरीन ग़ज़लकार सुनीति बैस जी की बारी थी|एक दिन के टास्क में सबको अपने स्वर में कविताएँ पढ़नी थीं| अपनी सुविधानुसार सबने पढ़ीं| यह टास्क उस वक़्त बहुत महत्वपूर्ण बन गया जब सबकी रचनाओं पर उषा किरण जी की काव्यमयी, सुन्दर और रोचक टिप्पणियाँ आनी शुरु हो गयीं|...