चित्र आधारित रचनाएँ - टास्क रचना दीक्षित
रचना दीक्षित द्वारा दिए गए टास्क में चित्र पर आधारित कोई रचना लिखने को कहा गया था। इस चित्र पर समूह में विविध प्रकार की रचनाएँ लिखीं गईं। प्रस्तुत हैं वे सभी रचनाएँ।
1.
दीवारों के भी कान होते हैं, ये मात्र एक कहावत है या एक महत्पूर्ण संदेश भी हम सबके लिए है।
महाभारत युद्ध के बाद श्रीकृष्ण से द्रौपदी ने रोकर पूछा..हे सखा, इतना संहार, इतनी हानि, अपने पुत्रों को भी मैं गवां बैठी, मेरा अपराध क्या इतना बड़ा था? मुझे ऐसा फल क्यों प्राप्त हुआ? तब श्रीकृष्ण ने कहा कि प्रत्यक्ष रूप से तो अनुचित कर्म नहीं पर वाणी के माध्यम से किया गया तुम्हारा कर्म तुम्हें इतनी पीड़ा दे गया। वाणी भी कर्म ही है ,तुम थोड़ा भी नियंत्रण अपनी वाणी पर रखती तो कदाचित् परिणाम इतना भयंकर ना होता। पसरे मौन को द्रौपदी का करुण रुदन चीर रहा था।
सच, ये वाणी की करामात है, कोई घृणित निंदा, विषैली अनुपयोगी गोपनीय बात, मुख से निकालनी क्या अत्यावश्यक है?
दीवारों के कान वाली बात कहने की है, वस्तुतः किसी अन्य के द्वारा सुने जाने का भय भी तो है, वो जो वाणी में निहित गोपनीय बात का अनुचित लाभ भी उठा सकता है।
यही दरकती दीवारों की तरह आज रिश्ते भी दरक रहे हैं..आपस का प्रेम पुरानी दीवारों पर पड़ी पपडी बन के उतर रहा है।
कहते है कि सुमधुर वाणी सकारात्मक ऊर्जा और कटु, कर्कश और श्राप से युक्त वाणी नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करती है जो हमारे शरीर को भी प्रभावित करती है।
क्यों ना इन दीवारों के अंदर भी हम व्यवहार और वाणी मृदु और संयत रखें। ना रिश्तों की दीवारें दरकेंगी, ना ही किसी के द्वारा ये कठोर वाणी सुने जाने का भय रहेगा। क्रोध को भी मौन में समेटते मैंने कई लोगों को देखा है जो अधिक प्रभावकारी होता है।
सबसे बड़ी बात...बात कोई भी हो, चाहे अच्छी गोपनीयता की भी हो, दीवारों के अंदर भी वाणी का स्वर संयत और मृदु रखने का प्रयत्न करें। दीवारों के पार सुने जाने का भय भी नहीं और आपसी रिश्ते भी मधुर।
ध्यान रखें कोई सही बात भी गलत तरीके से उच्च स्वर में क्रोध पूर्ण तरीके से बोली गई हो, वो सिर्फ और सिर्फ रिश्तों में नफरत ही घोलती है। आइए दरकती दीवारों के कानों को कुछ अच्छा ही सुनाएं 😊😊
मधु बत्रा
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2.
ये मेरे कान
फोड कर दीवारें
सच लें जान।
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दीवार फोड़
कान जो सुनते
झूठ की होड़।
**
कोमल कान
पत्थर की दीवारें
चीर के सुनें
**
ईंट गारे की
दीवारें साँस लेतीं
खबरें देतीं।
रेखा श्रीवास्तव
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3.
कान
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1- चुगली करती है हवा ,
भीतों के भी कान ।
बातें करिये सजग हो,
कहते संत सुजान ।
2- नेह नहीं पाते कभी,
कभी न पायें मान ।
प्रतिभा कहती जगत में,
जिनके कच्चे कान ।।
3- अब चुनाव के रंग में,
रॅंगा है हिन्दुस्तान ।
वादे ही वादे झरे ,
सुन-सुन पकते कान ।।
4- नयी पौध के ढंग अब,
लगते नहिं उन्वान ।
समझ न आये कौन,जो,
फूंके इनके कान ।।
5-जीत वही पाते सदा,
पाते लक्ष्य महान ।
व्यर्थ बतकही की तरफ,
कभी न देते कान ।।
6- डीजे आतिशबाजियां,
समारोह की शान ।
ओझल है आनंद अब,
केवल फटते कान ।।
7- भांति भांति के लोग हैं,
सब नहिं एक समान ।
तनिक सजगता जो घटी,
कट जाएंगे कान ।।
8- यह कब कैसे हो गया ,
नहीं तनिक भी भान ।
काग कान ले उड़ गया,
खबर न कानोंकान ।।
9- जीवन बन कर रह गया,
समस्याओं की खान ।
कहो, व्यथा किससे कहें,
बंद किये सब कान ।।
10- भले ही तुम कहते रहो,
सब जन एक समान ।
सामर्थों की भूल पर ,
कौन उमेठे कान ।।
डॉ प्रतिभा द्विवेदी
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4.
बदल जाती है दुनिया
बदल जाती है दुनिया
मात्र सुनाई देने पर
दो मीठे बोल प्यार के
क्रोधानल में जलती देह
सिसकती आत्मा
हो जाती है निस्तेज
शांत और निर्विकार
कमाल का योगदान है
इन कानों का
मानवमन के जीवन में
जो बना देते हैं
दुश्मन को दोस्त
दोस्त को दुश्मन
पल भर में
तभी तो कहते हैं
धीरे-धीरे बोल
कहीं दीवारें सुन न लें
क्योंकि ज़ज्ब हो जाते हैं
ज़ज्बात इन दीवारों में
साक्षी होती हैं यह
मानव मन के
सुख दुख की
घुटती तमन्नाओं की
दर्द की , चीख की
दरअसल सुनती रही
होती हैं यह मानव के
अंतर्मन की पुकार वर्षों से...।
डॉ मंजुला पांडेय
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5.
वो एक दीवार है। उम्र होगी कोई 77–78 साल, उसने भी हर जीव की ही तरह ईंट दर ईंट बढ़ना सीखा होगा। उम्र और कद बढ़ने पर जब लोगों ने टोका होगा उस पर भी पलस्तर चढ़ा होगा फिर लोगों की बुरी निगाहों से बचाने को उस पर रंग रोगन भी हुआ ही होगा कभी नीला, कभी सफेद, कभी पीला। उसे भी उसने आंचल की तरह सहेजा होगा। छेनी हथौड़ी की तरह-तरह की चोट खाकर अपने आपको संभाला होगा। खाने को कुछ मिला न मिला, बचा खुचा भी मिला तो ठीक, कभी पानी के कुछ छींटे ही सही, नहीं तो घर में होने वाली मारपीट में गालियों, लात-घूंसों से पेट तो भर ही लिया होगा। कभी जब उगी होगी कोई आस झूठी या सच्ची, चेहरे पर मुस्कुराहट आई तो जरूर होगी। ठीक उसी समय किसी ने चेहरे पर कालिख भी पोती होगी, कोयला घिस दिया होगा। छाती पर उसकी कभी कील भी गाड़ी गई होगी। कपड़े सुखाने को कपड़े लटकाने को, कभी तो कपड़े उतार कर या उतरवा कर, जबरदस्ती उसके मुंह पर मारे भी होंगे। कभी पेट के भीतर की किलकारी, कभी आंगन में किलकारी और सब हंसी ठट्ठे सुने तो उसने भी होंगे। हर तरह का शगुन जो हुआ होगा उस आंगन में काजल, मेहंदी, बिंदी, महावर आया तो उसके हिस्से भी होगा पर उसके हिस्से तो आए होंगे सिर्फ छींटे। शगुन का ढोल बजाकर उसी कील पर लटकाया गया होगा। नोटों से भरा थैला उसकी गर्दन में फंसाया गया होगा। गिर जाने या गुम हो जाने पर फिर उसे ही तो सुनाया गया होगा। "एक थैला नहीं संभलता तुमसे घर क्या खाक संभालोगी"। उसने भी अपनी यादों और उम्मीदों की पोटली अपनी छाती अपने दिल पर गड़ी उसी कील पर टांगी होगी। जब कभी टूटा होगा दिल, पड़ी होंगीं दरारें, लोगों के दिखाने भर को बस हल्की सी लीपा पोती करके छुपाया होगा सबसे। कहते हैं सब, वो हमेशा सीली सी, गीली सी ही मिली, मानों नमी से ही उसने सात फेरे लिए हों। फिर भी एक चट्टान सी रही वो। आपको दीवार सी लगती है तो लगे, मुझे तो वह एक स्त्री लगती है। वो जो कान से दिख रहे हैं न आपको, ये स्त्री बता रही है कि अपनी प्रथा, परम्परा, परिपाटी और कहावतें मुझसे ही चरितार्थ हैं इसलिए ही मैं सुनती हूँ या वो कह रही है कि मुझे कान दिए थे तो जरा सी जीभ भी दे देते या इतना सब होते हुए भी वो कह रही है कि मेरे कान आज भी तरस रहे हैं उसी किलकारी, उसी शोर को सुनने को। अब फैसला आपको करना है, वो दीवार है, स्त्री है या दीवार सी स्त्री है।
रचना दीक्षित
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6.
दब गया वो, या उसे चुन दिया गया बीच दीवार में
मजदूर हो शायद या दफ़न कर दिया गया आशिकी में ।
अर्चना चावजी
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7.
हाइकु
१.
लगाओ कान
टूटी दीवारों पर
पसरा मौन
२.
लंबे हैं कान
ह्रदय की ज़ुबान
सुने न कोई
-पूजा अनिल
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8.
एक कान से दूसरे कान
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" कहने दो कोई कुछ फालतू कहता है तो
एक कान से सुनो दूसरे से निकाल दो "
अपनी बेटी की डबडबाई आँखों को
मैंने चूमकर कहा ...
उसने जो कहा
वह सुनकर मैं ठिठक सी गई
" माँ , इतना आसान नहीं
दोनों कान के बीच एक दिमाग भी तो होता है
जो इसे कैच (ग्रहण)कर लेता है ..."
छोटी होकर वह बड़ी बात सीखा गई
" सच तो यही है "
एक कान से दूसरे कान से निकालने की बात कहना
जितना सहज है उतना सरल नहीं !
अगर सरल होता तो
बौखलाने की नौबत ही नहीं आती
खुद में बड़बड़ाने के हालात नहीं होते ।
......
हम भी न -
कई बार यूँ हीं माहौल को सहज रखने के लिए
बात को आई गई करने के लिए
कुछ भी कह देते हैं ...
....
जो बातें हर्ट करती हैं
वे कभी आई गई नहीं हो पातीं
न एक कान से दूसरे कान तक जाती हैं
वो जो बीच में एक दिमाग होता है
और होती है एक ज़ुबान
वह भी वर्क करता है
ज़बरदस्त वर्क -
सोचके देखिये
सारे नतीजे उसी के होते हैं ...
रश्मि प्रभा
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9.
दीवारों के भी कान होते हैं
कुछ कहावतें सुनने में बहुत ही अच्छी लगती हैं| कुछ ग्लैमर होता है उनमें, कुछ शोखी होती है और रोचकता तो भरपूर होती ही है| उन्हीं में से एक कहावत यह है कि ‘दीवारों के भी कान होते हैं|’
छोटे थे तो इस कहावत को पढ़ कर बड़ा रोमांच सा होता था| बड़ी हैरानी भी होती थी| पता नहीं किस दीवार के कान कितने तेज़ हैं| पता नहीं कौन सी बात सुन कर वह कैसे रिएक्ट करे| क्या दीवारों के मुँह भी होता है? क्या ये सुनी हुए बात किसीसे कह भी देती होंगी? या सिर्फ सुन कर अपने तक ही सीमित रखती होंगी? अगर मुँह नहीं होता है तो क्या खतरा है? किसीसे कुछ कह तो पाएंगी नहीं| गोपनीयता तो बनी ही रहेगी ना| तो अब बातों का सूत्र पकड़ में आया कि सारा खेल गोपनीयता का है|
दीवारों के कान होते हैं इसलिए कोई ऐसी बात न कही जाए कि पड़ोसी भी सुन लें और फिर वह जग जाहिर हो जाए| लेकिन यह तो ग़लत बात हुई ना| यानी कि ये दीवारें तो हमारे बुनियादी अधिकारों का ही हनन कर रही हैं| हम क्या अपने ही घर में नाप तोल कर बोलें? अब क्या हमें अपने घर की विश्वासघाती दीवारों को भी गिराना होगा? क्या पक्के मकानों की जगह तम्बू डेरे में रहने लगें? लेकिन अपनी निजता बरकरार रखने के लिए, पर्दों की ही सही, दीवारें तो वहाँ भी बनानी ही पड़ेंगी ना? तो यह तो तय रहा कि मनुष्य क्योंकि एक सामाजिक प्राणी है| वह समूह में रहता है तो अपनी निजता बनाए रखने के लिए उसे एक घर की ज़रुरत तो निश्चित रूप से पड़ेगी ही| फिर सिर्फ निजता ही क्यों, सर्दी, गर्मी, आँधी, तूफ़ान, ओले, बरसात इन सबसे बचाव के लिए भी तो घर ज़रूरी है| तो जहाँ घर होगा वहाँ दीवारें भी लाज़िमी तौर पर होंगी और दीवारें होंगी तो उनके कान भी होंगे और अगर ये दीवारें कहीं चुगलखोर हुईं तो आपकी तो समझ लीजिये कि शामत ही आ गईं| अब कोई यह कैसे पता करे कि दीवारें कच्चे कान वाली हैं या पक्के कान वाली| आज का युग होता तो ज़बरदस्त विज्ञापनों की मुहिम शुरू हो जाती अम्बुजा सीमेंट और अल्ट्रा टेक सीमेंट की तरह| बड़े-बड़े फिल्म स्टार भाँति-भाँति के अजीबोगरीब करतब दिखाते और विचित्र-विचित्र पोशाकें पहन कर हमें कन्विंस करने की कोशिश करते कि कौन सा उत्पाद लगाएं कि दीवारों के कान बिलकुल साउण्डप्रूफ़ हो जाएँ और वो एक भी बात इधर से उधर न कर पायें| खैर यह तो हुई बेबात की बात| सूत न कपास| थोड़ा सा शगल ही सही|
अब ये दीवारें तो क्या ही बोलेंगी लेकिन कच्चे कान वाली दीवारों के पार क्या हो रहा है इसका व्यौरा कभी-कभी चकित कर जाता है| यह किस्सा एक अति संवेदनशील, सहृदय लेखक महोदय ने बयान किया और अपने घर की कच्चे कान वाली खुराफाती दीवारों की करतूत पर अपना सर पीट लिया| तो किस्सा कुछ इस तरह शुरू हुआ| नए शहर में आने के बाद लेखक महोदय ने जिस घर में किराये पर रहने के लिए कमरा लिया उसी घर में दूसरी तरफ उनके मकान मालिक का बहुत छोटा सा परिवार रहता था| परिवार में चलने फिरने से लाचार एक वृद्ध माता जी थीं, उनकी एक बूटा सी बहू थी और एक बेटा था जो नौकरी के सिलसिले में किसी दूसरे शहर में रहता था और छुट्टी मिलने पर ही महीने में एकाध बार अपने घर आता था| बहू लम्बे घूँघट में ढकी बहुत संस्कारी, शालीन, हमेशा चुपचाप काम में लगी रहने वाली, दुबली पतली नाज़ुक सी लड़की थी जिसकी कभी आवाज़ तक नहीं सुनी थी किसीने| यह उन दिनों की बात है जब लोगों की ज़िंदगी बड़ी खामोश सी हुआ करती थी| एकदम सीधी सादी| न तो डी जे, लाउड स्पीकर्स का शोर ही था न घरों में टी वी वगैरह होते थे| शाम के बाद जब सन्नाटा छा जाता तो उस समय लेखक महोदय के अन्दर का साहित्यकार जाग जाता और वे मनोयोग से अपनी कलम और कॉपी सम्हाल कर बैठ जाते| लेकिन उनके कमरे की कच्चे कान वाली दीवारें उसी समय सक्रिय हो जातीं और दीवार के उस पार वाले हिस्से से बूढ़ी माँ जी की डाँट फटकार, चीखने चिल्लाने और अनर्गल प्रलाप का दौर उस सन्नाटे को तोड़ता हुआ कुछ इस तरह से शुरू हो जाता कि लेखक महोदय के दिल दिमाग पर हथौड़े से चलने लगते| वृद्धा क्या कहती थी वह तो समझ में नहीं आता था लेकिन यह बात बिलकुल स्पष्ट थी कि वह अपनी बहू पर ही चीख चिल्ला रही होती थी और उसीको धिक्कारते हुए गालियाँ देती रहती थी| वृद्धा की कर्कश आवाज़ देर तक गूँजती रहती और फिर धीरे-धीरे मद्धम होती हुई बंद हो जाती| थकान के मारे शायद वृद्धा को भी नींद आ जाती होगी| लेकिन लेखक का मन विचलित हो जाता| बेचारी बहू कैसे इस कठोर निर्दय सास के साथ निर्वाह करती होगी| उन्हें हैरानी भी होती किस मिट्टी की बनी है यह लड़की| कभी पलट के जवाब नहीं देती| कितना सब्र दिया है मालिक ने उसे| रोज़ रात का यही सिलसिला था| लेखक महोदय बिलकुल भी चित्त नहीं लगा पा रहे थे लिखने में| पड़ोसन बहू की व्यथा वेदना उन्हें व्यथित कर जाती| लेकिन कुछ उपाय भी तो नहीं था सास बहू की सुलह कराने का| उनके घर में कोई स्त्री नहीं थी जो मकान मालिक के घर में जाकर स्थिति को सम्हाल ले और मकान मालिक के घर में कोई पुरुष नहीं था जिससे लेखक महोदय स्वयं बात कर लेते| रोज़ रात को वृद्धा का अनर्गल एकालाप निर्बाध गति से चलता और बहुत कान लगा कर सुनने पर भी बहू का कोई भी जवाब लेखक को सुनाई नहीं देता| उसके धैर्य और सहनशीलता के लेखक कायल हो गए थे| मन ही मन उससे पुत्रीवत स्नेह भी करने लगे थे| उस पर उन्हें बहुत दया आने लगी थी| कभी-कभी मन करता बूढ़ी कर्कशा सास को जाकर जोर से झिंझोड़ दें| क्या उनके हृदय में ज़रा सी भी माया ममता नहीं है| कैसे वे इस मासूम सी बच्ची के प्रति इतनी निर्दय हो सकती हैं जो उनका इतना अत्याचार सहते हुए भी दिन रात उन्हीं की सेवा में लगी रहती है|
एक दिन तो हद ही हो गयी| सासू माँ का प्रलाप और प्रबल हो गया था| साथ ही किसी बर्तन को फेंक कर मारने की आवाज़ भी आई थी| शायद वृद्धा ने लोटा गिलास जो भी हाथ में आया हो वही फेंक कर बहू पर निशाना साधा था| लेखक महोदय घबरा गए| आज तो खून खच्चर होने की नौबत आ गयी है| वृद्धा तो वैसे ही अपाहिज है| बेचारी बहू अगर घायल हो गयी होगी तो उसे कौन उपचार के लिए ले जाएगा| लेखक महोदय के मन में पड़ोसी धर्म ज़ोर से करवटें लेने लगा| लेकिन इतनी रात में एकाएक उन स्त्रियों के घर में जाने की हिम्मत भी वो नहीं जुटा पा रहे थे| उनके कमरे में ऊँचाई पर छत के पास एक वेंटीलेटर लगा था जो मकान मालिक के आँगन में खुलता था| पहले उन्होंने वहाँ से वस्तु स्थिति का सही जायज़ा लेने का मन बनाया| अपनी लिखने की मेज़ पर पहले एक कुर्सी और फिर कुर्सी पर एक स्टूल रख कर उन्होंने हिलती डुलती मीनार सी बनाई और फिर बमुश्किल अपने बदन को साध किसी तरह वे वेंटीलेटर तक पहुँचे| मकान मालिक के आँगन में झाँका तो हैरानी से उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं| अपाहिज वृद्धा अपनी चारपाई पर औंधी पड़ी बहू से खाने के लिए रोटी माँग रही थी और बहू उसके सामने ही दूसरी खाट पर अपनी पूरी थाली सजा कर बैठी थी और चटखारे लेकर अचार से पराँठा खा रही थी और जब सास उससे खाना माँगती वह बेरहमी से उसे अँगूठा दिखा देती और जीभ निकाल कर उसे चिढ़ा देती| सास का प्रलाप और तेज़ हो जाता और बहू के मुख पर कुटिलता भरी मुस्कान और भी चौड़ी हो जाती| उसकी इस हरकत पर सास के मुख से गालियों का निर्बाध झरना बहने लगता था और ‘संस्कारी’, ‘शालीन’ बहू बेपरवाही से सास को मुँह बिराती, अँगूठा दिखाती आम के अचार की फाँक को मज़े ले लेकर कुतर रही थी|
अब बताइये ऐसे खुराफाती कान वाली दीवारों को आप क्या कहेंगे|
साधना वैद
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9.
दीवारों के कान नहीं ,आँखें भी होती हैं ।
निर्दोष ,मासूम आँखों के आँसुओं की साक्षी , माँ आयेंगी तो सब कुछ बताना है
पर जब माँ आती हैं तो सब भूलकर बस गोदी में सो जाने का मन करता है ।
रात के अंधेरों में झूलते ऊंचे पेड़ भूत बन डराते हुए ,वार्डन के भारी कदमों की आवाज़ ,सरसराते पर्दे ,दिन भर की थकी अधमुंदी पलकें ,नन्ही साँसे ,ये कान दिन रात भर बच्चों की बातें सुनते हैं ।
पर कुछ कर नहीं पाते ,कह नहीं पाते ।
कान दीवारों से लगे रहें तो घर में नहीं दिलों में दरारें पड़ जाती है ।
रश्मि कुच्चल
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10.
पक गए है कान,
नेताओं की बक बक
सुनकर
दीवारों के कान भी
अब बाहर आ गए
क्योंकि
उन्हें अब देखने
में विश्वास हो चला है।
दीवारों के भी कान
होते है,
ये मन के
मटमैले पन की
उपज है।
अब न ही दीवारों
के कान है
और ना ही
सुनने वालों के
कान है,
अब सिर्फ मोबाईल
के लिए कान है
जो मन के मटमैल
और गहरा और गहरा
करता जा रहा है।
शोभना चौरे
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11.
हासिल दीवारों का ...😁
......कहते हैं लोग ....
दीवारें सुनती हैं ,चुगली करती हैं...
पर कहती हूँ मैं ....
नही वो खाली चुगली ही नही करतीं
वो सृजन भी करती नई नई ध्वनियों का....
वो निर्वहन भी करती उन तमाम सिसकियों का ...
जो इन कमरों की चार दीवारों के बीच भरी थी हमने
औऱ अब भी तैयार हैं लेने को बैठी, जो हम भरेंगें औरों से छिपकर इसके कोनों के सहारे ..
हमसे हमारी रचनात्मकता के छिपे पहलू को अपने अंक में भर, हमसे कभी प्यार से तो , कभी जबरिया यही है लिखवाती
और जब हम अपनी किसी निजी पीड़ा से व्यथित हो ,उठा बैठ करते रात भर...
तो ये बन जाती एक सहारा हमारी टेक को अपनी कमर का सहारा देने के लिए...
और कुछ यादगार पलों की खूबसूरत तस्वीरे अपने जिस्म पे सजाती ये दीवार
और साथ ही घड़ी का झूलता पेंडुलम भी अपने माथे पे सजा ,हमे वक्त के साथ चलना सिखला जाती ये दीवार...
और जब आती कोई लाज शर्म की बात....
तो ये सीना तान बन जाती एक संस्कारी पर्दा
चार दीवारें खाली घुट घुट कर जीने का ही सबब नही बनती केवल
वो बनती हैं कभी कभी कारण नवसृजन का भी
सृजन सबके अपने अपने भांति भांति के...
तो
अब तो मत कहो यारों....
कि दीवारें खाली चुगली करती हैं...
अंजू(तितली).......
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