आपके राज्य में क्या खास है?

हम सभी कभी किसी पर्यटन स्थल पर जाने की योजना बनाते हैं तो सोचते हैं कि वहा़ क्या खास है जो देखा जाए| यूँ तो हर जानकारी गूगल पर उपलब्ध है पर यदि वहाँ के निवासी किसी स्थल पर मुहर लगा दें तो वह जगह निश्चित रूप से दर्शनीय है| हम लेकर आए हैं वही खास स्थान|

१. पटना- गोलघर - रश्मिप्रभा

बचपन में जब पटना जाते थे, तब यह गोलघर बहुत विशिष्ट लगता था, दूर से इसे देखते हुए _ कहानियों, इसकी बनावट और उँची घुमावदार सीढ़ियों के पन्ने सामने होते थे । चढ़कर तो खुद में खास सा लगा था । 

वक्त बदला, अब यह गोलघर मुश्किल से नजर आता है, देखकर तरस आता है, फिर भी यह अपना इतिहास लिए आज भी खड़ा है, कभी पन्ने पलटिए,  नई पीढ़ी के आगे रखिए,  आपके राज्य में हो न हो, पर है यह खास ।


रश्मि प्रभा

२. इंदौर राजबाड़ा - अर्चना चावजी

अहिल्याबाई होलकर ने यहां राज किया था, आज भी वही पुरानी शान बान लिए शहर के मध्य में खड़ा है,आसपास बाजार है,घनी बस्ती बसी है,एक तरफ सराफा बाजार जहां दिन भर सोने,चांदी की दुकानें खुली रहती है तो रात में खाने पीने की, और दूसरी तरफ खजूरी बाजार जहां पुस्तको की दुकानें हैं, पुरानी पुस्तके लगभग आधे दाम में मिल जाती हैं और उसी को साला भर पढ़ने के बाद उन्हें ही वापस बेच सकते हैं।स्टूडेंट्स को फायदा👍

एक खासियत और थी यहां की यहां क्रिकेट में 1983 में विश्वविजेता होने के बाद एक विजय बल्ला बनाया गया था जिसपर टीम के खिलाड़ियों के हस्ताक्षर थे ।अब वो लुप्त है।

अर्चना चावजी


३. बोधगया - ऋता शेखर

1. 

बोधगया-पीपल वृक्ष- फोटो गूगल से साभार


गौतम बुद्ध मंदिर-बोधगया-गूगल से साभार











बिहार के गया में स्थित बोधगया में गौतम बुद्ध को पीपल तले ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। वह तीर्थस्थल है। वहाँ गौतम बुद्ध की भव्य मूर्ति वाला मंदिर है। इसके अलावा थाई मंदिर और इंडो निप्पन मंदिर है।

2. यहाँ फल्गु नदी है जो जमीन से एक फ़ीट नीचे से बहती है। ऊपर जमीन पर चल सकते हैं, हाथ से ही गढ्ढे करने पर पानी निकल आता है। यह शापित नदी है। कहा जाता है कि वनवास से लौटने के बाद भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और सीता जी गया में राजा दशरथ का तर्पण करने आये थे। राम-लक्ष्मण सामान जुटाने बाज़ार गए। सीता जी अकेली बैठी थीं तभी फल्गु नदी से राजा दशरथ का हाथ निकला और वह पिंड की मांग करने लगे। सीता जी को कुछ समझ नहीं आया तो उन्होंने वहीं पर पड़े बालू से पिंड बनाकर उनके हाथ में दे दीं। इसके लिए उन्होंने नदी, केला का पेड़, गाय और एक पेड़ को साक्षी बनाया। जब राम वापस आये तो सीता ने सबकुछ बताया। राम जी को विश्वास नहीं हुआ। सीता ने एक एक करके सभी गवाहों से पूछा पर सिर्फ पेड़ ने सहमति बताई , बाकी तीन चुप रह गए। तब सीता ने फल्गु को श्राप देते हुए कहा कि तुम बहोगी पर दिखोगी नहीं। केला के पेड़ को श्राप मिला कि वह वर्ष में सिर्फ एक बार फल देगा। गाय को श्राप मिला कि उसको गंदे जगहों पर से खाना खाना पड़ेगा। वृक्ष को वरदान मिला कि वह कल्पतरु बनकर अमर रहेगा।

गया में फल्गु नदी के पास ही वह पेड़ है। 

3. वहाँ देश विदेश से पितृपक्ष में लोग पूर्वजों का श्राद्ध करने आते हैं। वहीं विष्णुपद मंदिर है जिसमें कोई मूर्ति नहीं, सिर्फ विष्णु जी के चरण हैं।

--ऋता

वैशाली, बिहार में प्रथम लोकतंत्र बना था। वह नर्तकी आम्रपाली की नगरी है जिसने गौतम बुद्ध की अगवानी की थी । बाद में उसने बौद्ध धर्म धारण किया।

4.बुन्देलखंड- वंदना अवस्थी दूबे

पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है हमारा बुन्देलखण्ड। बुन्देलखण्ड, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश, दोनों ही राज्यों में विस्तारित है। मध्यप्रदेश के छतरपुर, टीकमगढ़,पन्ना, सागर, दमोह, विदिशा, जबलपुर, कटनी, ग्वालियर, भिंड, मुरैना,  दतिया, और उत्तरप्रदेश के चित्रकूट, महोबा, जालौन, झांसी, बाँदा, हमीरपुर और ललितपुर शामिल हैं। 

हर जिले में प्राचीन किले और मंदिरों की भरमार है। वो चाहे खजुराहो हो या ओरछा। दतिया हो या झांसी-ग्वालियर। यहां का पुरातत्व देखते ही बनता है।

मुझे ओरछा बहुत आकर्षित करता है, अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक सम्पदा के कारण। कवि केशव ओरछा की देन हैं और राय प्रवीण कवि केशव की। एक झलक देखें ओरछा के महल की।

-- वंदना अवस्थी दूबे

५.आगरा- सूर सरोवर – कीठम झील - साधना वैद

आगरा की बात करें, तो सबसे पहले ताजमहल का नाम जुबान पर आता है। फिर कई मुगलकालीन इमारतों के नाम जैसे आगरा किला, सिकंदरा, एत्मादुद्दौला, फतेहपुर सीकरी आदि गिना दिए जाते हैं, लेकिन आज हम आपको बताने जा रहे हैं, आगरा के एक अनूठे प्राकृतिक स्थल के बारे में, जहाँ आपको अलग ही आनंद मिलेगा। चारों ओर हरियाली, पक्षियों की चहचाहट और दूर तक सिर्फ पानी ही पानी। हम बात कर रहे हैं, कीठम झील की। ये झील क्षेत्र एक पक्षी विहार भी है, जिसे सूर सरोवर पक्षी विहार के नाम से भी जानते हैं। सौ से अधिक प्रवासी पक्षियों की प्रजातियाँ यहाँ पाई जाती हैं इस झील में बोटिंग का आनंद भी लिया जा सकता है ! २७ मार्च १९९१ को सूर सरोवर पक्षी विहार को राष्ट्रीय पक्षी अभयारण्य का नाम दिया गया ! 

आगरा से करीब 22 किलोमीटर दूर कीठम झील रुनकता नाम के गांव के पास है। रुनकता आगरा जिले का एक छोटा सा कस्बा है !  यहाँ एक छोटा सा रेलवे स्टेशन भी है। राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर दो पर आगरा से दिल्ली जाते समय सिकन्दरा से आगे ये कस्बा है। इस हाईवे पर दाईं तरफ झील की तरफ जाने वाला प्रवेश द्वार आता है। हाईवे से करीब 1.20 किमी चलने के बाद प्रथम बार सड़क के दाहिने तरफ पानी से परिपूर्ण कीठम झील दिखती है। यहाँ से झील का स्वरूप बड़ा ही मनोरम दिखाई देता है, कुछ अनजान और विदेशी प्रवासी पक्षी भी अक्सर नज़र आते हैं। 

इसी स्थान पर सूर कुटी भी बनी हुई है ! कहते हैं महान भक्त कवि सूरदास जी ने इसी स्थान पर कृष्ण भक्ति में रमे अपने अनुपम काव्य की रचना की थी ! यहीं पर दृष्टिहीन छात्रों के लिए एक ब्लाइंड स्कूल भी है ! यमुना नदी के किनारे बना यह स्थान मन को अपार शान्ति देता है ! 

एक और विशिष्ट बात इस स्थान से जुडी हुई है कि यहाँ भालुओं का रेस्क्यू सेंटर भी है ! बेरहम मदारियों के चंगुल से इन भालुओं को छुड़ा कर यहाँ इनका समुचित इलाज व देख रेख की जाती है ! मदारियों के आतंक से ये भालू इतने भयभीत थे कि दर्शको को देखते ही वे अपने आप तमाशा दिखाने लगते थे ! मदारियों को उचित मूल्य देकर इन्हें उनसे खरीदा गया और अब इन्हें एक स्वाभाविक प्राकृतिक वातावरण में निर्भय होकर जीने का अवसर प्रदान करने का प्रयास किया जा रहा है ! यह स्थान वाकई देखने लायक है ! 

साधना वैद

६. बनारस-आराधना मिश्रा

वाराणसी गंगा के किनारे बसा प्राचीन शहर है जिसे बनारस या काशी भी कहते हैं। वाराणसी की संस्कृति का गंगा नदी एवं इसके धार्मिक महत्त्व से अटूट रिश्ता है। ये शहर सहस्रों वर्षों से भारत का, विशेषकर उत्तर भारत का सांस्कृतिक एवं धार्मिक केन्द्र रहा है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का बनारस घराना वाराणसी में ही जन्मा एवं विकसित हुआ है। भारत के कई दार्शनिक, कवि, लेखक, संगीतज्ञ वाराणसी में रहे हैं, जिनमें कबीर, वल्लभाचार्य, रविदास, स्वामी रामानंद, त्रैलंग स्वामी, शिवानन्द गोस्वामी, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पंडित रवि शंकर, गिरिजा देवी, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया एवं उस्ताद बिस्मिल्लाह खां आदि कुछ हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने हिन्दू धर्म का परम-पूज्य ग्रंथ रामचरितमानस यहीं लिखा था और गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन यहीं निकट ही सारनाथ में दिया था।

वाराणसी में चार बड़े विश्वविद्यालय स्थित हैं: बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइयर टिबेटियन स्टडीज़ और संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय। यहां के निवासी मुख्यतः काशिका भोजपुरी बोलते हैं, जो हिन्दी की ही एक बोली है। वाराणसी को प्रायः 'मंदिरों का शहर', 'भारत की धार्मिक राजधानी', 'भगवान शिव की नगरी', 'दीपों का शहर', 'ज्ञान नगरी' आदि विशेषणों से संबोधित किया जाता है।


प्रसिद्ध अमरीकी लेखक मार्क ट्वेन लिखते हैं: "बनारस इतिहास से भी पुरातन है, परंपराओं से पुराना है, किंवदंतियों (लीजेन्ड्स) से भी प्राचीन है और जब इन सबको एकत्र कर दें, तो उस संग्रह से भी दोगुना प्राचीन है।😊

७. ग्वालियर- गिरिजा कुलश्रेष्ठ

कर्नाटक में बैठी मैं गर्व से कह सकती हूँ कि मैं मध्यप्रदेश वासिनी हूँ . अगर इस समय मध्यप्रदेश में होती तो और भी गर्व और मान से कहती कि ग्वालियर मेरा गृहनगर है . मेरे सपनों का शहर . वास्तव में पूरा मध्यप्रदेश ही भारत का गौरव है हृदय प्रदेश है . इसकी विशेषताएं शोभना दीदी ,वन्दना ,अर्चना बहुत खूबसूरती से बयां कर चुकी है . मैं प्रदेश के पश्चिमी भाग से हूँ .ग्वालियर मुरैना ,जौरा ,कैलारस ,सबलगढ़ ,पहाड़गढ़ .इन सबसे जुड़ी हूँ . पहाड़गढ़ के जंगलों में छुपे पुरातत्त्व अवशेष , किला ,वीरपुर में कूनों नदी पर बना साइफन पुल, सिहोनियाँ का ककनमठ ,चम्बल के रोमांचक किस्से , ‘क्वारी’ का वैभव इन सबकी रोचक कहानियाँ है . ग्वालियर के आसपास भी अद्भुत कहानियाँ समेटे बटेश्वर के मन्दिर ,मितावली का चौंसठ योगिनी का मन्दिर ,तिघरा डैम ,आदि दर्शनीय पर्यटनस्थल हैं ,लेकिन ग्वालियर नगर स्वयं एक गौरवशाली अतीत और प्रगतिशील वर्त्तमान समेटे हुए है . यहाँ दुर्ग , तानसेन मकबरा , मोहम्मदगौस का मकबरा , मोतीमहल, बैजाताल ,जयविलास पैलेस, बाला साहेब की टोकरी ,जनकताल ,गरगज हनुमान, संग्रहालय आदि अनेक दर्शनीय स्थान हैं . यहाँ प्रतिवर्ष होने वाला तानसेन समारोह विश्वभर में प्रसिद्ध है . ग्वालियर घराना संगीत के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान रखता है .गजक और पेठा देशभर में प्रसिद्ध हैं. मेरे लिये शहर की सबसे विशिष्ट पहचान और गर्व की बात है शान से सिर उठाए खड़ा ग्वालियर का किला जो विश्व-धरोहर में शामिल किया जा चुका है . खूबसूरत मानमन्दिर इसकी पहचान है . शेष इमारतों में कर्ण महल ,शाहजहाँ महल , गूजरी महल ,सूरज कुण्ड ,तेली की लाट ,अस्सी खम्भों की बाबड़ी , सहस्रबाहु का मन्दिर (प्रचलित नाम सासबहू का मन्दिर) दाताबन्दी छोड़ गुरुद्वारा, सिन्धिया स्कूल आदि दर्शनीय इमारतें हैं .किले की ऐतिहासिक जानकारियाँ सब इन्टरनेट पर हैं . मेरे लिये यह अधिक महत्त्वपूर्ण है कि जब भी छत पर जाती हूँ मानमन्दिर का सौन्दर्य हदय को गर्व से भर देता है .    

अपना मध्यप्रदेश

भारत माँ का ह्रदय-प्रदेश

अपना मध्य प्रदेश ।

गौरवमय देता सन्देश

अपना मध्यप्रदेश ।


विन्ध्य, सतपुडा ,शिखर यहाँ

हरियाली है मुखर यहाँ ।

सिन्ध, बेतवा, क्षिप्रा चम्बल

ताप्ती और नर्मदा यहाँ ।

कण-कण जिसके बसे महेश

अपना मध्य-प्रदेश ।


साँची ,उदयगिरि माँडवगढ

भीमबैठका और ककनमठ

खजुराहो,सोनागिरि भी हैं

धुँआधार की सुनलो आहट

नैसर्गिक मनोहारी वेश

अपना मध्यप्रदेश ।


कालीदास माघ से कवि

और दुर्गावती अहिल्या सी ।

और अवन्तीबाई रानी

मातृभूमि की गरिमा सी ।

'विक्रम' थे विक्रम के वेश

अपना मध्यप्रदेश


विश्व-विरासत किला ग्वालियर

गालव ऋषि की तपोभूमि है

वीरांगना लक्ष्मीबाई की

यह अन्तिम कर्मभूमि है ।

शौर्य शक्ति के ये अवशेष

अपना मध्यप्रदेश ।

-- गिरिजा कुलश्रेष्ठ

८.नैनीताल -नैनी झील- डॉ मंजुला पाण्डेय

नैनी झील:

देवभूमि उत्तराखंड को दिया गया प्रकृति का अनुपम उपहार नैनीताल है जो कि एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल माना जाता है ।यहां प्रतिवर्ष हजारों की तादाद में लोग आते हैं और इसके हसीन नजारों का लुत्फ उठाते हैं ।यहां की नैनी झील बेहद खूबसूरत व सम्मोहित करने वाली है ।इसकी गहराई 28 से 30 मीटर मानी जाती है। नैनीताल का नाम इसी झील नैनी के नाम पर रखा गयाहै। इस झील के अंदर हरे हरे शैवाल व असंख्य मछलियां हैं ।कहते हैं प्राचीन काल में यहां जलपरी भी दिखाई देती थी।

       सरोवर नगरी नैनीताल की झील की सुंदरता व नौका विहार देखते ही बनता है। इस नौका विहार का आनंद उठाने के लिए रात दिन पर्यटकों का तांता लगा रहता है। मादक, सुगंधित, शीतल पवन ,खूबसूरत हरे भरे पहाड़ व शहर की रंगीनियों के बीच बसी यह नैनी झील  यात्रियों को अपनी ओर मानो खींचती है आवाज देकर बुलाती है ।

९. मेरठ- डॉ उषा किरण

औघड़नाथ मंदिर
उत्तर-प्रदेश का शहर मेरठ मुझे बेहद पसन्द है । कारण ये कि न तो ये दिल्ली मुम्बई जितना बड़ा है और न ही बहुत छोटा है। यहाँ पर जाट व मुस्लिम बहुल आबादी का असर बोल-चाल व संस्कृति पर दिखाई देता  है। चिकित्सा सुविधा हेतु अच्छे हॉस्पिटल व मेडिकल कॉलेज हैं । मेरठ शिक्षा के लिहाज से भी काफी सम्पन्न है।




कहते हैं कि मन्दोदरी मेरठ की थीं अत: इसे  रावण की ससुराल भी कहते हैं।। यहाँ एक प्राचीन शिव- मन्दिर भी है जो मन्दोदरी का मन्दिर कहलाता है। कहते हैं कि यहाँ की मिट्टी में कुछ ऐसा असर है कि श्रवण कुमार ने भी हरिद्वार ले जाते हुए अपने माँ- बाप की काँवड़ मेरठ आते ही पटक दी थी,  खैर लगता है ये किंवदंती किसी ने मजाक में ही बनाई होगी मेरठवासियों के अक्खड़पने को देख कर ।

औघड़नाथ मन्दिर अन्दर से

मेरठ की चाट, कुल्फी, दिल्ली वाले के छोले- भटूरे, राधे के छोले व कुल्चे आदि बहुत टेस्टी होते हैं।मेरठ जैसी टेस्टी चाट तो कहीं की नहीं होती।इसके अतिरिक्त यहाँ की रेवड़ी गजक भी बहुत स्वादिष्ट होती है। हर साल यहाँ पर मशहूर नौचंदी मेला भी लगता है जिसमें अनेक शहरों से दुकानें आती हैं।

नौचंदी मेला
दिल्ली पास होने के कारण प्राय: स्टुडेंट्स कोचिंग व पढ़ाई हेतु दिल्ली जाते हैं । दिल्ली के फैशन , रहन-सहन, कला व संस्कृति का असर भी मेरठ पर दिखाई पड़ता है।

लेकिन सबसे ज्यादा मेरठवासी जिस बात पर गर्व करते हैं वो है बाबा औघड़नाथ शिव मंदिर , जो एक प्राचीन सिद्धिपीठ है। इस मन्दिर में स्थापित लधुकाय शिवलिंग स्वयंभू, फलप्रदाता तथा मनोकामनायें पूर्ण करने वाले औघड़दानी शिवस्वरूप हैं। इसी कारण इसका नाम औघड़नाथ शिव मन्दिर पड़ गया। परतन्त्र काल में भारतीय सेना को काली पल्टन कहा जाता था। यह मन्दिर काली पल्टन क्षेत्र में स्थित होने से काली पल्टन मन्दिर के नाम से भी विख्यात है।


जनश्रुति के अनुसार, यह मन्दिर सन् 1857 से पूर्व ख्याति प्राप्त श्रद्धास्पद वन्दनीय स्थल के रूप में विद्यमान था। भारत के प्रथम स्वातन्त्रय संग्राम (1857) की भूमिका में इस देव-स्थान का प्रमुख स्थान रहा है। सुरक्षा एवं गोपनीयता के लिए उपयुक्त शान्त वातावरण के कारण अग्रेजों ने यहाँ सेना का प्रशिषण केन्द्र स्थापित किया था वीर मराठों के समय में अनेक प्रमुख पेशवा विजय यात्रा से पूर्व इस मन्दिर में उपस्थित होकर बड़ी श्रद्धा से प्रलयंकर भगवान शंकर की उपासना एवं पूजा किया करते थे।

मंदिर में 1857 के विद्रोह के शहीदों को सम्मान देने के लिए बनाया गया एक स्मारक भी है।  यह वह स्थल है जहां 1857 के युद्ध के सैनिकों ने अपने ऑपरेशन की योजना बनाई थी। एक संत यहां रहते थे जिन्होंने भारतीय सैनिकों से ब्रिटिश साम्राज्य को समाप्त करने के लिए प्रेरित किया था।10 मई 1857 को, भारतीय नागरिकों ने अंग्रेजों से आजादी के लिए इस स्थान पर शपथ ली थी।


भारतीय पल्टनों के निकट होने के कारण इस मन्दिर में अनेक स्वतंत्रता सेनानी आते, ठहरते तथा भारतीय पल्टनों के अधिकारियों से गुप्त मन्त्रणायें भी किया करते थे। इनमें हाथी वाले बाबा अपना विशिष्ट स्थान रखते थे। कहते हैं कि वह धूधपंत नाना साहब थे।मन्दिर के प्रांगण में स्थित कुएँ पर सेना के जवान पानी पीने के लिए आते थे। 1856 में बंदूकों के नये कारतूसो का आगमन भी स्वतंत्रता के प्रथम आन्दोलन का प्रधान कारण बना। इस कारतूसो का प्रयोग करने से पहले मुख से खोला जाता था, जिसमें गाय की चर्बी लगी रहती थी जिसकी वजह से मन्दिर के तत्कालीन पुजारी ने सेना के जवानों को पानी पिलाने से मना कर दिया। अतः निर्धारित 31 मई से पूर्व ही उत्तेजित सेना के 85 जवानों ने 10 मई 1857 को अंगेजों के विरूद्ध क्रान्ति का बिगुल बजा दिया। उनके कोर्ट मार्शल के बाद क्रांतिकारियों ने उग्र रूप अख्तियार कर लिया।


औघड़नाथ मंदिर हमारी संस्कृति और परंपराओं की धरोहर है। इसमें वस्तुत: तीन  मंदिर हैं, मुख्य तो भगवान शिव का मंदिर है और हाल ही में निर्मित श्री कृष्ण मंदिर और देवी माँ का मन्दिर भी है।बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस मंदिर में आस्था रखते हैं। शिव रत्रि पर भारी संख्या में कांवड़िये यहाँ जल चढ़ाते हैं।

  किसी समय पर यहाँ पर साम्प्रदायिक दंगे बहुत होते थे परन्तु अब लोगों ने मिलजुल कर रहना सीख लिया है तो बरसों से शान्ति है।ईश्वर करे कि मेरी मेरठ नगरी की  शान्ति और सौहार्द यूँ ही बना रहे।

-- डॉ उषा किरण

प्रस्तुति - ऋता शेखर 'मधु'


Comments

वाह, कितनी अच्छी बन पड़ी है यह पोस्ट. बधाइयाँ ऋता
Jyoti Dehliwal said…
विविध राज्यो की झलकियां बतलाती बहुत सुंदर पोस्ट।
Archana Chaoji said…
शानदार प्रयास हम सबको जानने का
जानकारियों का पिटारा।

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